शनिवार, 16 अप्रैल 2011

यात्रा: हिमाचल, पंजाब और हरियाणा की देविओं की

यात्रा का आरंभ



हर वर्ष की भांति इस बार भी नौ देविओं की यात्रा पर जाने का कार्यक्रम नवम्बर २०१० में ही बन गया था | वास्तव में हम दर्शन तो नौ से कम देविओं के करते है पर यात्रा का नाम नौ देविओं की यात्रा रखा गया है | नौ अंकों में बड़ा होता है या फिर शायद इसलिए कि कभी न कभी नौ देविओं के दर्शन हो ही जाएँ | हर बार मेरी इच्छा होती थी  कि इस बार नौ का आंकड़ा पूरा हो जाये | इस बार क्या होगा? इस बार के यात्रा की क्या खासियतें रहेंगी ? ये प्रश्न जेहन में हलचल कर रहे थे |


२७ मार्च'११  को यात्रा की शुरुआत थी शाम को ७ बजे से पर तैयारियां तो दो दिन पहले से ही शुरू हो गयी थीं | इस बार मैं, मेरी पत्नी सुमन और पिताजी के ही जाने का हिसाब बन रहा था |  हम इसी उधेड़-बुन में थे कि बच्चों को किसके हवाले किया जाय | बच्चे तो नानी के घर जाना चाहते थे पर हमें लौटने पर शैतानियों के लिए भाषण का डर था इसलिए मैंने ममेरे भाई को घर पर बुलाया था कि वह कुछ दिन अपना विश्वविद्यालय यहीं से जाये और बच्चों को संभल ले |  माँ तो दादी की सेवा में गाँव में पड़ी हैं | भाई के आने से मैं तो निश्चिन्त हो गया था पर एक ही बात मन को साले जा रही थी - अगर उसके परीक्षाओं में जरा भी नंबर कम हुए तो इसके जिम्मेदार हम ही बनेंगे |


रविवार की छुट्टी का दिन था और हम रास्ते के लिए कपडे और अन्य समाज सहेजते आपस में विचार कर रहे थे की छोटे लड़के अनमोल को साथ ले चलें ताकि भाई के ऊपर ज्यादे बोझ न पड़े की तभी फ़ोन की घंटी बजी | यात्रा के संचालक सुरेन्द्र भाई साहब का फ़ोन था | कार्यक्रम में बदलाव था | शाम ६ बजे के बजाय अब २८ मार्च को तडके ४ बजे प्रस्थान की सूचना देने के लिए फ़ोन किये थे |


 "अनमोल को साथ ले चलें ? गाड़ी में जगह हो जाएगी ?" मैंने सकुचाते हुए पूछा|


 "अनमोल को ही क्यों, बड़े को भी ले चलो | दो सीटें खाली हो गयीं है | किसी का प्रोग्राम रद्द हो गया है | बस में बच्चों से रौनक हो जाएगी |" वे बोले |


"पर हमारे पास अभी किराया देने को पैसे नहीं हैं और मई के पहले हम दे भी नहीं पाएंगे |" मैं बोला |


"पैसों के बारे में क्यों चिंता करते हो, बच्चों को ले चलो | पैसे बाद में आ जायेंगे | बस रात में ही लग जाएगी | सबेरे ४ बजे से देर न होने पाए | समय से आ जाना |" उन्होंने कहा और फ़ोन रख दिया |


कार्यक्रम में तबदीली होने के साथ ही काम भी बढ़ गया | बड़ा, अंशु जाने को तैयार ही नहीं हो रहा था | उसे चाचा का साथ अच्छा लग रहा था पर हमें पता था कि वह उसे परीक्षाओं की तैयारी में बाधित करेगा | जान-बूझ कर मुझे कड़क होना पडा  और इनके सामानों को एकत्रित कर बैगों में रखने का कार्य शुरू हो गया | यह तो अच्छा था कि हमने एक हफ्ते के लिए पहले से ही कपडे आदि तैयार कर रखे थे पर फिर भी सामान रखते-रखते १ बज गए | ऐसे अवसरों पर मेरी जिम्मेदारी बढ़ जाती है | मात्र ढाई घंटे की नींद के बाद जग गया |  पिताजी नहा धोकर तैयार थे | बच्चों को फटाफट तैयार कराया और हम बस के लिए रवाना हो गए |


जब हम बस के स्थान पर पहुंचे तो बस न पा कर चकित रह गए | घडी में साढ़े चार बज रहे थे | श्रीमती जी नाराज हो रहीं थीं | "तुम हमेशा देर कर देते हो | अब वे आगे निकल गए और रोकना पड़ेगा |" तभी सुरेन्द्र जी का लड़का दौड़ता हुआ निकला और हमें देखा तो "बस अभी आई है " बोलता हुआ सामने की तरफ दौड़ा | हमने देखा दूर में एक बस खड़ी है | बच्चे कुतूहल-वश उधर देखने लगे और श्रीमती जी होंठों में कुछ बुदबुदाने लगीं | बहरहाल पांच मिनट बाद बस हमारे सामने आ कर रुकी | हमें तब अहसास हुआ कि हम सबसे पहले आ गए थे | सामान रखते-रखाते १ घंटा निकल गया | समय कि पाबन्दी न रखना अपने देश में आम बात है, इस लिए कुछ समझदार लोग ६ बजे तक आये |  पूरे दो घंटे के विलम्ब से बस ६ बजे प्रातः बेला में लोधी रोड, दिल्ली से 'जय माता दी' के नारों की गूँज के साथ यात्रा पर प्रस्थान हुई |


खासियत संख्या १: बच्चे कार्यक्रम न होते हुए भी साथ जा रहे थे और इस बार यात्रा ब्रह्मा मुहूर्त में शुरू हो रही थी |

3 टिप्‍पणियां:

  1. हमने भी आपके साथ यात्रा कर ली...अच्छा लगा.
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